Exclusive Dehradun Darpan: तीन वर्षों में 1 हज़ार से अधिक लोग हुए अकाल मृत्यु के शिकार

संदीप ढौंडियाल की रिपोर्ट
देहरादून। आए दिन सड़क हादसों में न जाने कितने घरों के चिराग बुझ जाते हैं। न जाने कितनी पीढ़ियों का दुखद अंत हो जाता है। सड़क हादसों में हुए नुकसान की भरपाई शायद ही कोई सरकारें कर सकती हैं। या फिर अकाल मृत्यु के मुंह से शायद ही कोई अच्छी व्यवस्था किसी के प्राणों को खींच कर वापस ला सकती है। मगर इन सबके बीच जनता यह उम्मीद तो लगा ही सकती है कि वह सकुशल अपने गंतव्य तक पहुंच जाएं। इसके लिए हमें कोई चांद पर बने गड्ढों को नहीं भरना है। सिर्फ चांद जैसी चमचमाती हुई सड़कों को बनाना है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में सड़क हादसों को रोकना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। पहाड़ी क्षेत्रों के सड़क हादसों का सबसे मुख्य कारण वाहन चालक का नशे में होने से लेकर नींद आ जाना और क्षमता से अधिक सवारी या सामान को ढोना है। वहीं मैदानी भागों में वाहनों की भिड़ंत और बड़े वाहन चालकों पर मानसिक दबाव के चलते हादसे होते आये हैं। वहीं सड़कों की खराब स्थिति इन सबसे परे किसी भी व्यक्ति को काल के गाल में समाने का खुला न्यौता देते हैं।
आपदा कंट्रोल रूम से जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार बीते 3 सालों में राज्यभर में 1195 सड़क हादसे हुए हैं। जिसमें 1118 लोग इन हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं। यह वे आंकड़े हैं जो सिर्फ सरकारी कागजों में दर्ज हैं। वहीं इस वर्ष अब तक 117 लोग सड़क दुर्घटना में अपनी जान गवा चुके हैं। जिसमें से सबसे अधिक टिहरी जिले में 55 सड़क हादसे हुए हैं। जिसमें 44 लोगों को जान गंवानी पड़ी है। लाॅकडाउन होने के बावजूद भी सड़क हादसों में कोई खासा गिरावट देखने को नहीं मिली है। वहीं बीते 3 सालों में 2217 लोग सड़क हादसों में घायल होने के साथ ही 3 लोग लापता हुए हैं। आपदा कंट्रोल रूम के आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाएं जिला उधम सिंह नगर में हुए हैं। वहीं पहाड़ी जिलों में सड़क दुर्घटनाओं का अनुपात शहरी जिलों की अपेक्षा कुछ खास कम नहीं है। आपदा कंट्रोल रूम के आंकडों की माने तो इस वर्ष अब तक कुल 130 सड़क हादसे राज्यभर में हुए हैं। जिसमें देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर के सड़क हादसे शामिल नहीं हैं। वहीं इस वर्ष अब तक 117 लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा चुके हैं। साथ ही 196 लोग घायल होने के बाद ठीक हो चुके हैं।
पुलिस प्रशासन समय – समय पर सड़क हादसों को लेकर कई जन – जागरुकता अभियान चलाता रहा है। प्रशानिक अधिकारियों का कहना है कि अमूमन अधिक सड़क हादसे नशे में वाहन चलाने से लेकर ओवरलोडिंग और ओवरस्पीड के कारण होते हैं।
तेजी से स्मार्ट होती दुनिया में हर रोज नए सुरक्षा मानकों के साथ वाहनों को बाजार में उतारा जा रहा है। जो कि कुछ हद तक जान बचाने में सफल भी हैं। लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाले सड़क हादसों में किसी की जान बचाई जा सके ऐसा कोई भी सरकारी तंत्र या टेक्नोलॉजी अब तक विकसित नहीं हो पाई है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य जो पर्यटन और तीर्थाटन पर निर्भर हो उसके लिए जरूरी हो जाता है कि सड़कों को सदाबहार दूरुस्थ रखा जाए। इन सब को लेकर ऑल वेदर रोड एक अच्छे भविष्य की उम्मीद जगाने का काम कर रही है। वैसे राज्य के लिए राहत भरी खबर यह है कि यहां प्रतिवर्ष सड़क हादसों में लगभग 5 से 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा रही है। जिसे और कम किए जाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वहीं अगर समय रहते घायलों को अस्पताल पहुंचाया जाए तो यह दर और भी कम की जा सकती है।