घर का फिर मकान हो जाना’
घर का फिर मकान हो जाना’
कुछ पलों की मुलाकात, यूँ ही अरसा नहीं हो जाती, छोटी-छोटी सी बातें, यूँ ही किस्सा नहीं हो जाती मिटाना पड़ता है हर रोज, खुद को थोड़ा-थोड़ा, हस्तियाँ यूँ ही किसी का, हिस्सा नहीं हो जाती।
कतरे-कतरे में ही जी लेते हैं कई जिन्दगियाँ, कुछ लोग, यहाँ हर किसी के हिस्से जिन्दगी, पूरी-पूरी नहीं आती।
बोलते-छहकते घर, कब सन्नाटे के मकान बन जाते हैं पता ही नहीं चलता, चाहे अनचाहे किस खोज में, घर की किलकारियाँ, जाने कहाँ निकल जाती।
कभी जहाँ रोज की लकीरों के चलते फुरसत के दो पल भी न मिल सके…
वहीं महीनों से बिछाए बिछौने में अब एक सिलवट तक नहीं आती।
थोड़ी-थोड़ी मजबूरियों की पोटली लेकर चले ही जाते हैं सब एक दिन,
कुछ बूढ़ी सूनी आँखों की आशाएँ.. ……..वहीं धरी की धरी रह जाती।
(सरोजनी सुरेश जोशी)