विरासत महोत्सव-2026 में रविवार को जौनसार-बावर के लोक नृत्यों से सजी सांस्कृतिक संध्या, पारंपरिक नृत्य टांडी ने भी सभी पर किया मनमोहक जादू

 

देहरादून- – विरासत महोत्सव में इस बार भी बुजुर्गवार कारों व बूढ़े दर्जनों दोपहिया वाहनों ने अपनी पहचान और ताकत का एहसास कराते हुए दून की सड़कों पर अपना प्रदर्शन “हम किसी से काम नहीं” के रूप में किया I

विरासत महोत्सव के भव्य आयोजन स्थल हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र नींबूवाला में यह बुजुर्गवार कारों एवं बूढ़े दुपहिया वाहनों की लंबी-लंबी लाइन लग गई जिन्हें देखने के लिए उत्तराखंड वासी भी बहुत ही हैरान नजरों से इन सभी वाहनों को निहार रहे थे, यही नहीं जब इन बुजुर्ग चार पहिया एवं दोपहिया वाहनों ने अपने हौसले बुलंद करते हुए सड़कों पर हुंकार भरी और दौड़ लगाई तो लोगों के हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था I विरासत में आज रविवार को बहुत ही अधिक आकर्षण का केंद्र बनी यह बूढ़ी कारें एवं दोपहिया वाहनों को उत्साह पूर्वक देखने के लिए लोगों की काफी भीड़ रही I खासतौर से यंग जेनरेशन यहां पर मौजूद नजर आया I उन्होंने इन वाहनों के साथ उत्साह और उमंग के साथ अपने-अपने मोबाइल फोन से सेल्फियां भी जमकर लीं। विरासत महोत्सव-2026 के अंतर्गत आज बूढ़ी दर्जनों की संख्या में बाइक और कार रैली का आयोजन किया गया। इस आयोजन रैली को देखने के लिए लोगों में काफी उत्साह देखा गया I रैली में बड़ी संख्या में इठलाते हुए बाइक और कार सवारों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। इन सभी बाइक एवं कार चालकों ने अपने-अपने वाहनों को बहुत ही आकर्षक ढंग से सजाया और नहलाया हुआ था I आयोजन में प्रतिभाग करने वाले दुपहिया वाहनों स्कूटर तथा मोटर साइकिलों की कुल संख्या 51 रही, जबकि बूढ़ी कारों की संख्या 28 रही। इन सभी वाहनों के मॉडल देश ही नहीं विदेशों के भी रहे, जिनके विषय में स्वयं वाहनों के स्वामियों एवं खरीदारों द्वारा जानकारियां दी गई I

बुजुर्गवार वाहनों की इस रैली को विरासत आयोजन समिति की उपाध्यक्ष सुनेना अग्रवाल और द हिमालय ड्रग कंपनी (हिमालया वेलनेस कंपनी) के चेयरमैन डॉ. एस. फारूक ने फ्लैग ऑफ कर रवाना किया। डॉ. एस. फारूक एक प्रतिष्ठित शोधकर्ता, शिक्षाविद् और परोपकारी व्यक्तित्व भी हैं।

रैली विरासत महोत्सव आयोजन स्थल से प्रारंभ होकर सेवन ओक्स स्कूल, पुराने विरासत स्थल, ओएनजीसी, किशननगर, चकराता रोड, बिंदाल से होते हुए घंटाघर पहुंची और वहां से चकराता रोड, बिंदाल पुल से होकर वापस विरासत महोत्सव हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र पहुंची। खास बात यह देखने को मिली कि इन बूढ़ी कारों व बूढ़े दर्जनों दुपहिया वाहनों को लोग घंटों तक निहारते ही रहे, उनकी सरपट दौड़ सड़कों पर देखते समय तो और भी अधिक उत्साह एवं आकर्षक लोगों का उमड़ा रहा I विरासत महोत्सव के तहत आयोजित इस रैली ने महोत्सव के माहौल में आज जोश और ऊर्जा का संचार भी जमकर किया।

विरासत महोत्सव-2026 में रविवार को जौनसार-बावर के लोक नृत्यों से सजी सांस्कृतिक संध्या, पारंपरिक
नृत्य टांडी ने भी सभी पर किया मनमोहक जादू

देश-विदेशों की ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित एवं संजोए रखने वाली विश्व विख्यात “रिच” संस्था द्वारा आयोजित विरासत महोत्सव-2026 में आज रविवार को भी शानदार रूप में लोक कला संस्कृति का अद्भुत एवं अमूल्य प्रदर्शन किया गया I एक और जहां जौनसार बावर के कलाकारों द्वारा की गई आकर्षक भव्य लोकगीतों व नृत्यों से विरासत की महफिल में रंग जमा रहा, तो वहीं, बहार-ए-लखनऊ की नृत्य श्रृंखला में कृष्णा मोहन की प्रस्तुति से भी सभी शाही मेहमान ओत-प्रोत हो गए I

विरासत में रविवार को सांस्कृतिक संध्या की पहली प्रस्तुति उत्तराखंड राज्य के प्रसिद्ध जौनसार बावर के कलाकारों द्वारा बहुत ही शानदार रूप में प्रदर्शित की गई I विरासत की इस महफिल में लोक सोर संगम की ओर से जौनसार-बावर के पारंपरिक लोक नृत्यों की प्रस्तुति ने सभी मेहमानों के हृदयों को जीत लिया। देवेंद्र रावत के निर्देशन में 20 सदस्यीय दल ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से क्षेत्र की लोक संस्कृति और परंपराओं की झलक को बहुत ही खूबसूरती के साथ पेश किया। कार्यक्रम की शुरुआत महासू वंदना से हुई, जबकि समापन नाटी नृत्य के साथ किया गया। इस दौरान दल का प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य तांडी भी आकर्षण का केंद्र बना रहा।

दल में विनोद कुमार रलसिंगा, अमित ढोल पर, विनोद दुमाऊं पर, अनुज कीबोर्ड पर बने रहे, जबकि गिटार पर सोनू, ढोलक पर प्रिंस तथा आशीष नेगी ने पैड पर संगत शानदार रूप में दी। वहीं, गायन की जिम्मेदारी अनुप चंद, सचिन वर्मा और मोनिका आर्या द्वारा संभाली गई। नृत्य दल में नितिन दयाल, सूरज वर्मा, विशाल वर्मा, सुभाष खन्ना, मनोज वर्मा, आंचल वर्मा, मिलन वर्मा, वंशिका दयाल, आरती नेगी और प्रकृति मेहरा शामिल रहे। मुख्य बात यह रही कि पारंपरिक वाद्ययंत्रों, लोकगीतों और नृत्य के संगम से सजी इस प्रस्तुति ने दर्शकों को जौनसार-बावर की समृद्ध लोक संस्कृति से बड़ी खूबसूरती के साथ रूबरू कराया।

सुप्रसिद्ध शास्त्रीय लोक सांस्कृतिक कलाकार कृष्णा मोहन के बहार-ए-लखनऊ लोक नृत्य से विरासत के मेहमान हुए ओत-प्रोत

विरासत का अन्दाज़ : “बहार-ए-लखनऊ” में दिखी नवाबी तहज़ीब, अदब और मुगल अंदाज की शाही झलक

विरासत महोत्सव-2026 में कृष्ण मोहन की नृत्य प्रस्तुति का शाही अंदाज़ भी खुशनुमा बना रहा और “बहार-ए-लखनऊ” के मार्फ़त लखनऊ की संस्कृति, अदब और नवाबी दौर की कुछ झलकियों को मंच पर उतारा गया। इस प्रस्तुति की कोरियोग्राफी और निर्देशन कृष्ण मोहन ने किया। इसमें वाजिद अली शाह के दौर के संदर्भ में लखनऊ की कहानी को नृत्य और संगीत के माध्यम से बहुत ही खूबसूरत अंदाज में बयां किया गया I इस प्रस्तुति में आठ लड़कियों ने नृत्य के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया, जबकि राघवेंद्र ने सूत्रधार की भूमिका निभाई। प्रस्तुति में मीनू गारू, नेहा भगत, देविका, अन्वेशा, रितिका, राधा, राजश्री और नियारिका कलाकार शामिल रहीं।
नवाबी दौर के रंग में सजी इस आकर्षक प्रस्तुति में सूफी कलाम, ग़ज़ल, तराना और सलामी को मुगल अंदाज में पेश किया गया। संगीत और नृत्य के मेल से तैयार इस कार्यक्रम ने लखनऊ की तहजीब, उसकी सांस्कृतिक पहचान और बीते दौर की कलात्मक परंपराओं को दर्शकों के सामने जीवंत किया गया तो सभी ओत प्रोत हो उठे।

विरासत में टीएम कृष्णा के कर्नाटक संगीत का भी शाही मेहमानों ने उठाया लुत्फ़ और बंध गया समां

विरासत की खुशनुमा महफ़िल में कर्नाटक संगीत की बहुत ही जानी मानी हस्ती प्रसिद्ध लोक गायक टीएम कृष्णा ने भी अपनी गायकी से श्रोताओं को काफ़ी अधिक मग्न मुग्ध कर दिया I कृष्णा ने शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा से शाही मेहमानों को रूबरू कराया। उनकी प्रस्तुति में कर्नाटक संगीत की बारीकियों और सुरों की गहराई देखने को मिली। इस संगीतमय प्रस्तुति में स्वरनलता ने वायलिन पर संगत की, जबकि ए रोहित ने मृदंगम पर साथ दिया। तीनों कलाकारों की त्रिकोणीय ग़ज़ब और शानदार जुगलबंदी ने प्रस्तुति को खास बनाया और श्रोताओं को दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत की खूबसूरती का अनुभव कराते हुए विरासत-ए-महफ़िल में चार चांद लगा दिए I उन्होंने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत राग कीरावानी से की।

रामोन मगसासी पुरस्कार के विजेता, कर्नाटक संगीतकार, लेखक थोडुर मदबुसी कृष्णा भारत की शास्त्रीय संगीत की कठोर कर्नाटक परंपरा के प्रमुख गायकों में शुमार हैं। उन्होंने बी सीताराम शर्मा, चेंगलपेट रंगनाथन और सेम्मंगुडी श्रीनिवासियर जैसे प्रतिष्ठित गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया है। उन्होंने समाज सुधारक और दार्शनिक श्री नारायण गुरु की कविताओं को कर्नाटक संगीत में लाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई। यही नहीं,अशोक विश्व विद्यालय के सहयोग से टीएम कृष्णा वर्तमान में ‘द एडिक्ट प्रोजेक्ट’ में लगे हुए हैं, जिसका उद्देश्य शिलालेखों के इर्द-गिर्द जीवंत सौंदर्यपरक, सामाजिक-राजनीतिक और अकादमिक संवादों को बढ़ावा देना है।
वर्ष 2016 में कृष्णा को ‘कलाकार और पैरोकार के रूप में भारत के गहरे सामाजिक विभाजनों को भरने में कला की शक्ति के प्रति उनकी सशक्त प्रतिबद्धता’ के सम्मान में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। इसके अलावा वर्ष 2017 में उन्हें भारत में राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और संरक्षित करने में उनके योगदान के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार से भी सम्मान मिल चुका है I