सूखते स्रोत और बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते गांव

संदीप ढौंडियाल
देहरादून। ग्रीष्म काल आते ही उत्तराखंड में विगत दो-तीन दशकों से एक बड़ी बात निकलकर सामने आई है। मार्च-अप्रैल का महीना आते ही बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते गांव की संख्या में बहुत बड़ा इजाफा हुआ है। समय के साथ यह संख्या हर वर्ष बढ़ते ही जा रही है। यूं तो उत्तराखंड गंगा, यमुना जैसी नदियों का मायका है और यहां पर लगभग 1300 से 1500 मिमी प्रति वार्षिक दर से वर्षा भी होती है। यदि क्षेत्रफल के हिसाब से देखा जाए तो 53, 483 वर्ग किलोमीटर में लगभग 70 अरब घन मीटर पानी प्रतिवर्ष बहता है। परंतु एक ओर वर्षा जल भूमि पर गिरता है वहीं दूसरी ओर सीधे पहाड़ी से नीचे को बह जाता है। जिस कारण रह जाते हैं पहाड़ों में प्यासे के प्यासे कई गांव। दरअसल पहाड़ी गांव की बसावट कुछ इस तरह से होती है जहां अधिकांश गांव नदियों से ऊपर चोटियों पर बसे होते हैं।
पहले लोगों को पानी की आवश्यकता कम थी और आवश्यकता के अनुरूप जल संरक्षण के तौर-तरीके भी उन्हें मालूम थे। पर विगत कई दशकों में हमने ऐसी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है जिसमें समाज जल परंपराओं से दूर होता गया। जो पानी समाज की धरोहर होता था, वह सरकार से मिलने वाली एक वस्तु हो गई। नदी की जगह नल आ गए और वह नल एक – एक बूंद पानी की कीमत वसूलने लगे। वहीं आज के समय में पानी को सरकार से भी छीन कर व्यवसायियों ने हथिया लिया है। शुद्ध पानी के नाम पर तरह-तरह की मशीनें लगा दी गई हैं। बोतल बंद पानी आज एक बहुत बड़ा बाजार बन चुका है। बाजार की सीधी गणित है कि जिसकी जेब में जितना अधिक धन है उसकी खरीद की पहुंच उतनी ही अधिक हो जाती है। शुद्ध पानी के नाम पर तमाम कंपनियां ऊंचे से ऊंचे दामों में पानी को कई रूपों में बेच रहे हैं। इस पानी के पूरे खेल का एक अर्थ यह भी निकलता है कि गरीब के लिए बाजार में पानी उपलब्ध नहीं है।
हिमालय जिसे भारत का जल गुंबज भी कहते हैं। एक तरह से प्रकृति की ओर से प्राप्त महा वरदान स्वरुप एक विशाल जलाशय है। जिससे पूरे भारत कि लगभग 63.21 प्रतिशत जल की आपूर्ति होती है। जिसकी तीन महत्वपूर्ण जल प्रणालियों में ब्रह्मपुत्र जल प्रणाली, गंगाजल प्रणाली और सिंधु जल प्रणाली आती है। इनमें गंगाजल प्रणाली उत्तराखंड से है। गोमुख से निकलते हुए गंगा कुल 2601 किलोमीटर की यात्रा में देश के लगभग 42 प्रतिशत से अधिक लोगों का अन्न – जल का प्रबंधन करती है। गंगा को गंगा बनाते हैं यहां की असंख्य छोटी-छोटी धाराएं और स्रोत। उत्तराखंड के लोक मानस में एक कहावत बड़ी प्रसिद्ध है ‘गाड मेटिक गंगा’। जिसका अर्थ है अनेक लघु सरिताओं (छोटी-छोटी नदियों) को जोड़कर गंगा बनती है। तब जाकर हमें ऋषिकेश में विशाल गंगा के दर्शन होते हैं। कुछ अध्ययनों ने बताया है कि ऋषिकेश गंगा में पिछले 100 वर्षों में लगभग 30 प्रतिशत जल की कमी आई है। साथ ही यह भी बताया है कि ऋषिकेश गंगा नदी जल में सिर्फ 33 प्रतिशत जल ही ग्लेशियरों का है और बाकी मध्य हिमालय से उपजी हुई नदियों का जल है।
स्रोतों के सूखने का सबसे बड़ा असर मध्य हिमालय में हुआ है। जिनमें अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, चंपावत रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के कुछ क्षेत्र आते हैं। इन्हीं क्षेत्र में उत्तराखंड की घनी बस्तियां बसी हुई हैं। अब इन क्षेत्रों में तेजी से नदियां घट रही हैं या सूख रही हैं। जैसे रुड़की की सोनाली नदी, देहरादून की रिस्पना, ऋषिकेश की चंद्रभागा, नैनीताल की कोंकडझाडा और पौड़ी की हिंवल नदी जो कुछ समय पहले तक बारहमासी नदियां थी, अब मौसमी नदी या बरसाती नदी बनकर रह गई हैं। इसी तरह अल्मोड़ा की कोसी नदी, पौड़ी की नयार, पुरोला की कमल गंगा, जौनसार की अखलाड और कोटद्वार की मालिनी नदियां आज धीरे-धीरे सूखने की कगार पर हैं। अल्मोड़ा को पानी देने वाली कोसी नदी का हाल यह है कि जिस नदी में 1992 में 790 लीटर प्रति मिनट का बहाव था, वह घटकर 2016 में 50 लीटर प्रति मिनट रह गया है। इन नदियों के सूखने का सीधा – सीधा मतलब होता है कि गांव में पाए जाने वाले उन जल स्रोतों और तालाबों का सूख जाना जिनसे यह नदियां तैयार होती हैं। जल स्रोतों को सदाबहार रखने के लिए समाज का अपना एक परंपरागत ज्ञान था। जिसमें गांव के ऊपरी पहाड़ी पर वर्षा जल को रोकने या थामने के लिए लगभग 30 कदम लंबी, 25 से 30 कदम चौड़ी और लगभग दो-तीन कदम गहरी खाई का निर्माण किया करते थे। जिसे चाल – खाल कहा जाता था। गढ़वाल – कुमाऊं में अनेक जगहों के नाम इन्हीं खालों के नाम पर ही हैं। जैसे नौगौंखाल, बीरोंखाल, सपेराखाल, उफरैंखाल, बूंखाल, चौबट्टाखाल आदि। यह चाल – खाल अक्सर पहाड़ के ऊंचाई वाले जगहों पर होती थी। इनमें प्लास्टिक और सीमेंट का प्रयोग नहीं होता था। कच्ची मिट्टी से बने होने के कारण गर्मियों के समय में जानवरों के लिए पीने के पानी उपलब्ध कराते थे। वहीं इनसे धीरे-धीरे पानी भी पहाड़ी पर रिसता रहता था। जिससे पहाड़ी के नीचे सुंदर घास और वर्षा के जंगल तैयार होते थे। पानी के रिसाव से जंगल हमेशा नमीदार बने रहते थे। जिस कारण गर्मियों में जंगल आग से भी सुरक्षित बचे रहते थे। चाल – खाल और नमीदार जंगलों के कारण गांव के जल स्रोत हमेशा पानीदार रहते थे। यही पानी धीरे-धीरे गांव के नजदीक से ही छोटी-छोटी सरिताओं का उद्गम स्थल बनता था।
आने वाली चुनौतियों को देखते हुए हमें जल संचय के लिए समाज की पुरानी पद्धतियों को समझने और आधुनिक रूप से कार्य करने की जरूरत है। अगर उत्तराखंड में बरसने वाले जल का 5 प्रतिशत जल भी संग्रह किया जाये तो जल स्रोत नहीं सूखेंगे और गांव प्यासे नहीं होंगे। साथ ही यहां से निकलने वाले महानदियों की भी अविरलता बनी रहेगी।